Sunday, December 24, 2017

दान या सौदा

दान या सौदा 

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे ।

रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु – एक जिज्ञासा है  मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?

श्री कृष्ण ने कहा – अर्जुन , तुम मुझसे बिना किसी हिचक , कुछ भी पूछ सकते हो ।

तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा ।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया ।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो ।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया ।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया ।

उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया ।

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी ।

अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए ।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे ।

उनमे अब तक अहंकार आ चुका था ।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे ।

इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे ।

जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी ।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब  मुझसे यह काम और न हो सकेगा ।

मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए ।

प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया  

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो ।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये ।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये ।

ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए ।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया ?

श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को शिक्षा

इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था ।

तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है ।

उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे ।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था ।

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया ।

वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए ।

वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे ।

उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता ।

यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है ।
इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया , अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।

निष्कर्ष

दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है ।

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए ।

ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, न कि हमारा अहंकार ।

अपि संपूर्णता युक्तैः कर्तृव्या सुहृदो बुधैः।
नदीशः  परिपूर्णोऽपि    चन्द्रोदयमपेक्षते।।

 भावार्थ-- जिस प्रकार समुद्र को अथाह जल राशि के होते हुए भी ज्वार उत्पन्न करने के लिए चन्द्रमा की आवश्यकता पडती है। 
उसी तरह सर्वगुण संपन्न विद्वान् व्यक्ति को भी किसी विशेष कार्य को संपन्न करने के लिये अपने मित्रों की सहायता की आवश्यकता पडती है।

जंगल-जंगल ढूँढ रहा ! मृग अपनी "कस्तूरी" को,
कितना मुश्किल है तय करना. "ख़ुद से ख़ुद" की दूरी को..!
          
अजय सिंह "जे एस के "


मनुष्य-जन्म का उद्देश्य

मनुष्य-जन्म का उद्देश्य

गुरु अर्जुन देब जी समझाते हैं:-
"कई जनम भए कीट पतंगा।
कई जनम गज मीन कुरंगा।।
कई जनम पंखी सरप होइओ ।
कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ।।
मिल जगदीस मिलन की बरीआ।
चिंरकाल इह देह संजरीआ।।"

कई जन्म कीड़ों-पतंगों के पाये,कई जन्म हाथी,मछली और हिरणों के पाये;कई जन्म पक्षियों और साँपो के मिले और कई जन्म घोड़ों,पशुओं और पेड़-पौधों के पाये। काफी समय के बाद परमात्मा ने अपनी भक्ति के लिए अब यह इंसान का जामा बख्शा है।हमें इससे पूरा फायदा उठाना चाहिये।

मौलाना रूम फ़रमाते है;-
"हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा अम,
नुह सदो-हफ्ताद कालिब दीदा अम।"
वनस्पति की तरह मैं कई बार पैदा हुआ हूँ और नौ सौ सत्तर शरीर मैने देखे हैं।

एक और फ़कीर फ़रमाते है:-
"गाहे शजर दर बाग़-हा गाहै समर बर शाख़-हां।"
कई बार मैं घास और सब्ज़ी की तरह पैदा हुआ हूँ और सैकड़ों शरीर मैंने देखे है।कभी बाग में दरख़्त बना हूँ, कभी दरख्तों पर फल बनकर लगा हूँ।

ऋषि-मुनियों ने मनुष्य-देह को नर-नारायणी देह कहकर बयान किया है,मुसलमान फ़कीर इसे अशरफुल-मख़लूक़ात कहते हैं और यहूदियों का ख्याल है कि परमात्मा ने हमें अपनी खुद की शक्ल पर बनाया है।

अजय सिंह "जे एस के" 

नारी का स्वरुप

द्रोपदी का सत्यभामा को नारी-धर्म का उपदेश



देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलंकृत: ।
द्रव्यवानभिरुपोवा न मेऽन्य: पुरुषोमत: ।।
भावार्थ― देवता, मनुष्य, गन्धर्व, युवक अच्छी सज धज वाला धनवान अथवा परम सुन्दर कैसा ही पुरुष क्यों न हो, मेरा मन भर्ता (पति) को छोड़कर कहीं नहीं जाता।

दुर्व्याह्रताच्छंकमाना दु:स्थिताद् दुखेक्षिताद् ।
दुरासिताद् दुर्व्रजितादिङ्गिताघ्यासितादपि ।।
भावार्थ―मेरे मुख से कभी कोई बुरी बात न निकल जाय।इस बात से सदा सावधान रहती हूं। असभ्य की भांति कहीं खड़ी नहीं होती। निर्लज्ज के समान इधर उधर कभी दृष्टि नहीं डालती। बुरी जगह पर अथवा असभ्यतापूर्ण से कभी नहीं बैठती। दुराचरण से बचती तथा चलने-फिरने में असभ्यता न हो जाये इसके लिए सदा सावधान रहती हूं। इशारे, भावभंगिमा तथा अत्यन्त आग्रह (किसी बात पर अड़ जाना) आदि से भी कतराती हूं।

नाभुक्तवति नास्ताते नासंविष्टे च भर्तरि ।
न सदिशामि नाश्नामि सदा कर्मकरेष्वपि ।।
भावार्थ― पति और अपने सेवकों को भोजन कराये बिना में कभी भोजन नहीं करती, उनको स्नान कराये बिना मैं कभी स्नान नहीं करती और जब तक वे (पति) सो नहीं जाते  तब तक मैं कभी नहीं सोती हूं।

अतिरस्कृतं सम्भाषा दु:स्त्रियो नानु सेयती ।
अनुकूलवती नित्यं भवाम्यनलसा सदा ।।
भावार्थ―अपनी बोल-चाल या बात-चीत में कभी किसी का मैं तिरस्कार नहीं करती हूं। दुष्ट स्त्रियों के सम्पर्क से सदा बचती हूं। नित्य अनुकूल बर्ताव करती हूं और आलस्य को कभी अपने पास फटकने नहीं देती।

अनर्म चापि हसितं द्वारि स्थानमभीक्ष्णश: ।
अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये ।।
भावार्थ― पति के साथ हास-परिहास के सिवा मैं कभी अनवसर हंसी नहीं करती। बार बार दरवाजे पर जाकर कभी खड़ी नहीं होती। घर के पास लगे बगीचों में अकेले देर तक घूमते रहने से भी बचती हूं।

अन्त्यालापमसन्तोषं परव्यापारसंकथाम् ।
अतिहासातिरोषो च क्रोधस्थानं वर्जये ।।
भावार्थ― नीच पुरुषों के साथ कभी बात नहीं करती, अपने मन में कभी असन्तोष को नहीं आने देती, पराये कार्यों की चर्चा से सदा बचती हूं। न कभी अधिक हँसती हूं। न रोष करती हूं। क्रोध से बचती हूं।

यदा प्रवसते भर्ता कुटुम्बार्थेन केनचित् ।
सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी ।।
भावार्थ― जब कभी मेरे पति परिवार के किसी भी कार्य से प्रवास पर प्रदेश चले जाते हैं, उन दिनों मैं न फूलों का श्रृङ्गार धारण करती हूं और न अङ्गराग लगाती तथा निरन्तर व्रत व संयम का आचरण करती हूं।

पत्याश्रयोहि मे धर्मों मत: स्त्रीणां सनातन: ।
स देव: सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत् ।।
भावार्थ― मैं इस बात को मानती हूं कि पति के आश्रय में रहना ही स्त्रियों का सदा से चला आया धर्म है। क्योंकि पति ही उसका देवता है। पति ही उसकी गति है। पति के अतिरिक्त कोई दूसरा उसका सहारा नहीं है। ऐसे पतिदेव का कौन स्त्री अप्रिय करेगी।

अहं पतिन् नातिशये नित्यश्ने नाति भूषये ।
नापिश्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता ।।
भावार्थ―पतिदेव के सोने से पहले कभी शयन नहीं करती, उसके भोजन करने से पहले कभी भोजन नहीं करती, उसकी इच्छा के विपरित कभी अपने आपको अलंकृत नहीं करती, अपनी सास की कभी निन्दा नहीं करती, अपने को सदा नियन्त्रण में रखती हूं।

प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं सांवशामि च ।
नित्यकाल महं सत्ये ! एतत् संवननं मम ।।
भावार्थ― हे सत्यभामा ! प्रतिदिन मैं सबसे पहले जागती हूं और बाद में सोती हूं। यह पति-भक्ति और सेवा ही मेरा वशीकरण मन्त्र है।

एतज्जानाम्यहं कर्त्तव्यं भर्तु सवननमहत् ।
असत्स्त्रीणां समाचारं नाहं कुर्या न कामये ।।
भावार्थ― पति को वश में करने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय यही मैं जानती हूं। दुराचारिणी स्त्रियाँ जिन उपायों का आचरण करती हैं, न तो मैं उन्हें करती हूं और न करने की कामना ही करती हूं।

नैतादृशं दैवतमस्ति सत्ये सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु ।
यथा पतिस्तस्यतु सर्वकामा लभ्य: प्रसादात् कुपितश्चहन्यात् ।।
भावार्थ― हे सत्यभामा ! देवताओं सहित सम्पूर्ण लोकों में स्त्रियों के लिये अपने पति के समान कोई अन्य देवता नहीं है। पति की प्रसन्नता से नारी की सम्पूर्ण कामना सफल हो सकती हैं और यदि पति कुपति हो जाय तो वह नारी की समस्त आशाओं को नष्ट कर सकता है।

इसीलिये तो मानव धर्मशास्त्र प्रणेता मनु ने कहा―

दाराधीनस्तथा स्वर्ग ।
अर्थात् स्वर्ग (गृहस्थ जीवन की सुख-शान्ति) नारी के आधीन है।

"नारी का स्वरुप" पुस्तक से,लेखक-स्वामी भूमानन्द सरस्वती

अजय सिंह "जे एस के "

निराशा से बचने का उपाय




न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ । 
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
- श्री कृष्ण, गीता
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है ।


निराशा से बचने के लिए एक सूत्र है. भूतकाल से सीखिए, वर्त्तमान का अच्छे से अच्छे उपयोग कीजीए व भविष्य के प्रति आशान्वित रहिए. हर बुरी से बुरी परिस्थिति को सहन करने को तत्पर रहिए तथा अच्छे से अच्छे के लिए प्रयत्नशील रहिए. दूसरों से यह अपेछाएं न रखें कि वे आपकी बात मान ही जायेँगे. आपके बताए रास्ते पर चल ही पड़ेंगे .

यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो अपना ध्यान समस्या खोजने में नहीं, समाधान खोजने में लगाइए. हर हकीकत शुरू में एक सपना होती है,और जब करने वाले लग जाते है तो वो हकीकत हो जाती है.

अजय सिंह "जे एस के "