Sunday, December 24, 2017

दु:ख का कारण



सहृदयं सामनस्यमविद्वेषं कृणोमि व:।
अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या।।

यह अथर्ववेद का मन्त्र है ।इसमें प्रमुख तीन शब्द है,सहृदयं ,सामनस्यम् अविद्वेषम्।इनमे से दो को धारण करना और एक को त्यागने के लिये कहा गया है।

प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है ,क्योंकि मनुष्य श्रेष्ठ प्राणी है इसलिए वह सुख प्राप्त करने का प्रयास भी करता है ,लेकिन सभी को सुख नहीं मिलता। जो सुख प्राप्त करने मे बाधाये है वे ही दु:ख का कारणहै।

योग दर्शन मे इन्हें क्लेश कहा गया है।ये पांच है अविद्या,अस्मिता ,राग ,द्वेष और अभिनिवेश ।इनमे अविद्या अस्मिता और अभिनिवेश मे अविद्या कारण है और अस्मिता और अभिनिवेश कार्य है।

अब मानसिक स्तर पर दो ही क्लेश बचते है एक राग दूसरा द्वेष ।सारा संसार रोज दो दु:खो मे ही घूमता है किसी से राग तो वह दु:ख का कारण है , किसी से द्वेष तो दु:ख का कारण है।

परिवार मे या समाज मे आवश्यक नहीं कि सभी के विचार समान हो।वैचारिक मतभेद होने पर आपस मे विवाद हो सकता है यही द्वेष का कारण है इससे बचने के लिये पहला काम तो यह कि बोलचाल बन्द न करे ।
दूसरा यह कि बात का उत्तर देते समय यह सोचे कि जो हम कहने जा रहे है क्या उसे कहने का यह सही समय है ? यदि हम उस समय यह विचार कर लेते है तो द्वेष से बच सकते है।

दूसरा शब्द सांमनस्यम् का महत्त्व है मन के दोष दूर करना ।जैसे किसी स्थान को सजाने से पहले वहाँ सफाई की जाती है उसी तरह मन्त्र मे सौंदर्य को बढाने वाले दो शब्द है सहृदयं और सांमनस्यम् देखने मे लगता है दोनों का अर्थ समान है लेकिन महर्षि दयानन्द सहृदयं का अर्थ लिखते है माता पिता ,सन्तान ,स्त्री -पुरुष ,भृत्य ,मित्र ,पडोसी व अन्य के लिए अपने समान सुख की कामना और दु:ख से दूर रहने की इच्छा करना ।और सांमनस्यम् का अर्थ मन की प्रसन्नता ।सहृदयम् शब्द दो अर्थो मे आता है पहला हृदय जो शरीर मे रक्त का प्रवाह करता है , हरति ददाति याति इति हृदयं अर्थात् जो लेता है देता है और चलता है उसे हृदय कहते है।परन्तु यहाँ हृदय शरीर का अवयव नहीं बल्कि सुख दुख अनुभव करने वाले को हृदय कहा है ।

एक दूसरे की भावना को समझना विचारो का मिलना सहृदय या सौहार्द कहलाता है।हम रोज लोगो को दुखी कष्ट मे देखते है उनके लिए हम परेशान नहीं होते परन्तु यदि हमारा अपना कोई कष्ट मे है तो बहुत परेशान हो जाते है ।यही सहृदयता है।और आगे मन्त्र मे एक उपमा दी गई है कि हम परिवार मे कैसे रहे ? मन्त्र कहता है जैसे नवजात बछड़े को गाय प्यार करती है वैसे ही हम आपस मे करे।गाय अपने बच्चे से इतना प्यार करती है कि उसकी रक्षा के लिए वह शेर से भी टकरा जाती है। यही परिवार मे रहने का ढंग वेद मे कहा है।

अजय सिंह "जे एस के "

अज्ञानी अर्जुन और भगवत कृपा

अज्ञानी अर्जुन और भगवत कृपा 

महाभारत का युद्ध चल रहा था।  अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। 

 जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता,  कर्ण का रथ दूर तक पीछे चला जाता। 

 जब कर्ण का बाण छूटता, तो अर्जुन का रथ सात कदम पीछे चला जाता। 

 श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रशंसा के स्थान पर 
 कर्ण के लिए हर बार कहा... 
कितना वीर है यह कर्ण?

जो उनके रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है।अर्जुन बड़े परेशान हुए। 

असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे...

हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों?  मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा नहीं करते... 
एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण को बारम्बार वाहवाही देते है। 

श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन तुम जानते नहीं...

तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान... 
एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हैं।

यदि हम दोनों न होते... 
तो तुम्हारे रथ का अभी अस्तित्व भी नहीं होता। 

 इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं। 

अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि हुई।

 इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह तब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ। 

प्रत्येक दिन अर्जुन जब युद्ध से लौटते...
श्रीकृष्ण पहले उतरते, 
फिर सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते।

अंतिम दिन वे बोले-अर्जुन... 
तुम पहले उतरो रथ से व थोड़ी दूर जाओ। 

भगवान के उतरते ही रथ भस्म हो गया। 

अर्जुन आश्चर्यचकित थे।
भगवान बोले-पार्थ...
तुम्हारा रथ तो कब का भस्म हो चुका था।

भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य
व कर्ण के  दिव्यास्त्रों से यह नष्ट हो चुका था।  मेरे संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था। 

अपनी श्रेष्ठता के मद में चूर अर्जुन का अभिमान चूर-चूर हो गया था। 

अपना सर्वस्व त्यागकर वे प्रभू के चरणों पर नतमस्तक हो गए। 
अभिमान का व्यर्थ बोझ उतारकर हल्का महसूस कर रहे थे...

अजय सिंह "जे एस के "

*वदतु संस्कृतम*

*वदतु संस्कृतम* 

अंग्रेजी में *'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG'* एक प्रसिद्ध वाक्य है। अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर उसमें समाहित हैं। किन्तु कुछ कमियाँ भी हैं :-

1) अंग्रेजी अक्षर 26 हैं और यहां जबरन 33 अक्षरों का उपयोग करना पड़ा है। चार O हैं और A,E,U तथा R दो-दो हैं। 

2) अक्षरों का ABCD... यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।         
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*अब संस्कृत में चमत्कार देखिए.!*-
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.    *क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।*
*तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।*

       (अर्थात्)- पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। 

          आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।
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*एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार...*
 
माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "भ" और "र " दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है-
 
*भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।*
*भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।*
              अर्थात् धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार, वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया। 
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*किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल "न"  व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है* और गजब का कौशल्य  प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है:-

*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।*
*नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।*

       अर्थात्  जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।। 

अजय सिंह "जे एस के "


भगवद चिन्तन


भगवद चिन्तन


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

प्रायः हर व्यक्ति आज अपने अभाव को लेकर परेशान है जबकि अभाव कुछ है ही नहीं।

पूर्ण परमात्मा ने पूर्ण जगत को बना अपना पूर्ण ज्ञान, सारा वैभव धन सम्पत्ति ऐश्वर्य सब कुछ खुले हाथों हमारे लिए बिना भेदभाव बिना पक्षपात के न्यायिक प्रक्रिया से लुटा दिया।परमात्मा यहीं नहीं रुका जीव को भी स्वतंत्र छोड़ दिया जितना चाहिए तुझे उतना लेले, पर यह भोला मानव अभाव, अकर्मण्यता तथा अश्रद्धा की बलिबेदी पर स्वयं चढ़ संकुचितता से समग्रता की ओर, व्यष्टि से समष्टि की ओर स्वयं से पूर्ण सृष्टि की ओर पहुंचने का रत्ती भर भी प्रयास तो करे। उसकी पूर्णता में जीने का पुरुषार्थ तो करे

वह जिस दिन यह जान लेगा कि पूर्ण चेतन पिता अपने पूर्ण ज्ञान द्वारा मेरे साथ पूर्ण जड प्रकृति माता समस्त सामिग्री लिए मेरे साथ, सर्वत्र विद्यमान है फिर मैं क्यों अल्पज्ञ और अपूर्ण रहूँ क्यों अभाव में जीयूँ।

यदि पूर्णता में निजता का प्रवेश करा दूँ तो निदान आसान और सम्भव हो जाएगा। जैसे पानी से भरे टब में खाली लौटा भी डूब कर भरा रहता है।




         दूसरों को सुख पहुँचाने के लिए स्वयं कष्ट उठाना और दूसरों की भूख मिटाने क लिए स्वयं भूखा रहना, यही तो महानता की परिभाषा है। दुनिया तुम्हें महान कहे, यह महत्वपूर्ण नहीं अपितु दुनिया की नज़र अंदाजी के बावजूद भी तुम महान कार्य करते हो, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
        प्रदर्शन महानता का लक्षण नहीं अपितु पर पीड़ा का दर्शन महानता का लक्षण है।एक व्यक्ति समाज द्वारा पूजा जाता है और एक व्यक्ति द्वारा किसी गरीब के आँसुओं को पौंछा जाता है। एक व्यक्ति की सेवा दुनिया करती है और एक व्यक्ति दुनिया की सेवा को ही अपना ध्येय बना लेता है।
         एक व्यक्ति की आरती सब लोग उतारते हैं और एक व्यक्ति सबके आर्त (दुःख) उतारने के लिए संघर्षशील बना रहता है। जिनके मन में दूसरों के लिए करुणा का भाव है वही लोग वास्तव में महान हैं।

अजय सिंह "जे एस के "

भगवद चिन्तन


       


भगवद चिन्तन






दुनिया में जितने भी धर्म हैं, पंथ हैं, सम्प्रदाय हैं, उन सबका एक ही उद्देश्य है और वो है हमें मानव बनाना। हम छल-कपट के आचरण का त्याग करके सरल और सहज होकर जीवन जीयें, यही धर्म की आज्ञा है। 

       हमारे कारण किसी को दुःख ना पहुचें, ऐसा निरन्तर चिन्तन ही यज्ञ है। यज्ञ का अर्थ है सब प्रकार की हिंसा से मुक्त हो जाना। यज्ञ करते समय अपने भीतर के पशु को भी होम कर देना सच्चा यज्ञ है। ख़तम ना कर सको तो उसे नियंत्रित कर लो, साध लो, यही साधना है।


भजन है क्या ? 

 आदत बुरी सुधार लो बस हो गया भजन,
 मन की तरंग मार लो बस हो गया भजन।

 कोई तुम्हें बुरा कहे उसको करो क्षमा,
वाणी के स्वर संभाल लो बस हो गया भजन।

जाना है सबको एक दिन दुनिया को छोड़के,
जीवन को तुम संवार लो बस हो गया भजन।


अजय सिंह "जे एस के"